तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार एक दिलचस्प और चर्चा में रहने वाला ट्रेंड सामने आया है। राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों—DMK, AIADMK, BJP और Congress—ने इस बार एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। खासतौर पर एआईएडीएमके का यह फैसला ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी ने पिछले 35 वर्षों में पहली बार ऐसा कदम उठाया है।
राज्य में ब्राह्मण समुदाय की आबादी लगभग 3 प्रतिशत मानी जाती है, लेकिन इस चुनाव में उनकी राजनीतिक भागीदारी लगभग नगण्य दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदलते सामाजिक समीकरण और वोट बैंक की राजनीति के चलते प्रमुख दलों ने इस समुदाय को प्राथमिकता नहीं दी।
एआईएडीएमके का बदला रुख
AIADMK का यह फैसला सबसे ज्यादा चर्चा में है। कभी M. G. Ramachandran (एमजीआर) और J. Jayalalithaa के दौर में ब्राह्मण उम्मीदवारों को नियमित रूप से टिकट मिलता था। हालांकि, जयललिता के निधन के बाद पार्टी की रणनीति में बदलाव देखा गया।
2021 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने केवल एक ब्राह्मण उम्मीदवार—पूर्व डीजीपी आर. नटराज—को मैदान में उतारा था। इस बार पूरी तरह से इस समुदाय को टिकट न देना, पार्टी की नई सामाजिक-राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है।
अन्य दलों की भी समान रणनीति
DMK और Congress ने भी इस चुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवारों को मौका नहीं दिया है। वहीं, BJP, जिसे ब्राह्मण वोट बैंक का पारंपरिक समर्थन माना जाता है, उसने भी किसी ब्राह्मण चेहरे को टिकट नहीं दिया, हालांकि संगठनात्मक स्तर पर समर्थन बनाए रखने की कोशिश की गई है।
राज्य की अधिकांश सीटों पर इस बार ओबीसी समुदाय के उम्मीदवारों का दबदबा है, जो तमिलनाडु की सामाजिक संरचना और द्रविड़ राजनीति की दिशा को दर्शाता है।
टीवीके और एनटीके ने अपनाया अलग रास्ता
जहां बड़े दलों ने ब्राह्मण उम्मीदवारों से दूरी बनाई है, वहीं नई और क्षेत्रीय पार्टियों ने अलग रणनीति अपनाई है। अभिनेता Vijay की पार्टी TVK ने दो ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।
इसी तरह NTK ने छह ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जिनमें चार महिलाएं और दो पुरुष शामिल हैं। पार्टी प्रमुख Seeman का रुख पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग माना जा रहा है, जिसमें ब्राह्मण समुदाय को भी प्रतिनिधित्व देने की बात की जा रही है।
क्या बदल रहा है तमिलनाडु का राजनीतिक समीकरण?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल उम्मीदवार चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य की राजनीति में गहरे सामाजिक पुनर्संतुलन का संकेत है। ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की ओर बढ़ा है, जिससे अन्य दलों ने अपने कोर वोट बैंक पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है।
हालांकि, टीवीके और एनटीके जैसे दलों का कदम यह संकेत देता है कि भविष्य में छोटे लेकिन प्रभावशाली समुदायों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिशें बढ़ सकती हैं।
तमिलनाडु चुनाव 2026 में यह नया ट्रेंड आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

