कोलकाता
पश्चिम बंगाल में आगामी चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी माहौल पूरी तरह गरमा गया है। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के बीच इस मुद्दे पर तीखा टकराव देखने को मिल रहा है, जबकि कांग्रेस और वाममोर्चा ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया है।
राज्य में हुए इस व्यापक पुनरीक्षण के बाद करीब 91 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की खबर ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। यह संख्या हर विधानसभा क्षेत्र के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि आम मतदाता इस पूरी प्रक्रिया को किस नजर से देख रहा है।
TMC का आरोप: वैध वोटरों को हटाने की साजिश
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने SIR को शुरू से ही ‘जन विरोधी’ कदम करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम जानबूझकर हटाए गए हैं, खासकर अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया गया है।
ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को सड़क से लेकर अदालत तक जोर-शोर से उठाया। कोलकाता में विरोध मार्च, बनगांव में पदयात्रा और 114 घंटे का धरना—इन सबके जरिए उन्होंने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की। उन्होंने SIR को CAA और NRC से जोड़ते हुए यह भी आशंका जताई कि नाम कटने वाले लोगों को डिटेंशन कैंपों तक भेजा जा सकता है।
भाजपा का पलटवार: ‘घुसपैठियों की सफाई’
वहीं भाजपा ने इस प्रक्रिया का खुलकर समर्थन किया है। पार्टी का कहना है कि SIR का उद्देश्य अवैध घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करना है और इससे वैध मतदाताओं को कोई नुकसान नहीं होगा। भाजपा नेताओं ने बार-बार यह भरोसा दिलाया है कि यदि किसी असली मतदाता का नाम कटता है तो वे उसके समर्थन में खड़े होंगे।
भाजपा सांसद शांतनु ठाकुर ने तो यहां तक कहा कि अगर मतुआ समुदाय के किसी भी व्यक्ति का नाम सूची से हटाया गया, तो पार्टी आंदोलन करेगी। भाजपा लगातार तृणमूल पर ‘घुसपैठियों की राजनीति’ करने का आरोप भी लगा रही है।
कांग्रेस-वाम का ‘मिडिल पाथ’
तृणमूल के तीखे विरोध और भाजपा के पूर्ण समर्थन के बीच कांग्रेस और वाममोर्चा ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया है। इन दलों ने SIR का सीधा विरोध नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा कि किसी भी हालत में एक भी वैध मतदाता का नाम नहीं कटना चाहिए।
चुनावी असर पर नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे मुद्दे का सबसे बड़ा फायदा या नुकसान तृणमूल कांग्रेस को ही हो सकता है। अगर ममता बनर्जी जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल रहती हैं कि SIR उनके खिलाफ है, तो उन्हें सहानुभूति का लाभ मिल सकता है। वहीं, यदि मतदाता इसे सही प्रक्रिया मानते हैं, तो भाजपा को फायदा मिल सकता है।
फिलहाल, बंगाल की राजनीति में SIR एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है। अब देखना यह होगा कि जब मतदाता ईवीएम का बटन दबाएंगे, तो इस विवाद का असर किसके पक्ष में जाता है।

