इस्लामाबाद/तेहरान/वॉशिंगटन:
अमेरिका और ईरान के बीच हालिया दो सप्ताह के युद्धविराम (सीजफायर) में पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका ने उसे एक बार फिर क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर की खुलकर सराहना करते हुए उन्हें ‘प्रिय भाई’ तक कह दिया। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की मध्यस्थता को स्वीकार किया।
बैकचैनल कूटनीति से बनी राह
सूत्रों के अनुसार, सीजफायर से पहले पाकिस्तान ने पर्दे के पीछे लगातार सक्रिय भूमिका निभाई। सेना प्रमुख असीम मुनीर ने अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। बताया जा रहा है कि अमेरिका के प्रस्तावों को ईरान तक पहुंचाने और तेहरान की प्रतिक्रिया को वॉशिंगटन तक भेजने में पाकिस्तान ने ‘मध्यस्थ पुल’ का काम किया।
इसके अलावा 29 मार्च को पाकिस्तान ने तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की एक अहम बैठक भी आयोजित कराई, जिसमें मध्य पूर्व के तनाव को कम करने पर चर्चा हुई। इस पहल ने पाकिस्तान की भूमिका को और मजबूत किया।
क्यों बना पाकिस्तान भरोसेमंद मध्यस्थ?
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मध्यस्थ के लिए दोनों पक्षों का भरोसा जरूरी होता है। ईरान को अपने कई अरब पड़ोसियों पर संदेह रहा है, क्योंकि उनके अमेरिका से करीबी संबंध हैं। ऐसे में पाकिस्तान एक संतुलित विकल्प बनकर सामने आया।
पाकिस्तान और ईरान के बीच सीमा साझा होती है और दोनों देशों के संबंध अपेक्षाकृत स्थिर रहे हैं। वहीं पाकिस्तान के इजरायल के साथ राजनयिक संबंध न होना भी ईरान के लिए भरोसे का कारण बना। दूसरी ओर, हाल के वर्षों में अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में भी सुधार हुआ है, जिससे उसे दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने में मदद मिली।
पाकिस्तान को क्या मिला फायदा?
इस सीजफायर से पाकिस्तान को केवल कूटनीतिक सफलता ही नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक लाभ भी मिला है। पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक मध्य पूर्व पर निर्भर हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के चलते तेल की कीमतों में उछाल आया था, जिससे उसकी पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा था।
इसके अलावा खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों पाकिस्तानी नागरिकों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा था। ऐसे में क्षेत्र में शांति पाकिस्तान के लिए बेहद जरूरी थी।
आगे की राह आसान नहीं
हालांकि यह युद्धविराम अभी नाजुक माना जा रहा है। यदि यह समझौता टूटता है, तो पाकिस्तान की कूटनीतिक साख को झटका लग सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के पास इतना सामरिक प्रभाव नहीं है कि वह लंबे समय तक इस समझौते को लागू करवा सके।
फिलहाल पाकिस्तान ने एक अहम कूटनीतिक जीत हासिल की है, लेकिन इस सीजफायर की स्थिरता ही तय करेगी कि यह सफलता स्थायी बनती है या अस्थायी उपलब्धि साबित होती है।

