आठ गांव और एक रिश्ता: यहां सामूहिक संकल्प से बसते हैं निर्धन कन्याओं के घर

IMG-20230522-WA0021
previous arrow
next arrow
CG City News

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के बघेरा स्थित बाबा मरसपोटा धाम में आठ गांवों के सामूहिक प्रयास से निर्धन कन्याओं के विवाह कराए जाते हैं। 2018 से अब तक 32 कन्याओं की शादी हो चुकी है, जिसमें सभी रस्में पूरी गरिमा से निभाई जाती हैं।

News Article Hero Image

 

HighLights

  1. 2018 से अब तक 32 निर्धन कन्याओं का विवाह।
  2. आठ गांव मिलकर उठाते हैं विवाह का पूरा खर्च।
  3. बाबा मरसपोटा धाम में सभी रस्में गरिमा से संपन्न।
रिश्ते केवल खून या परिवार से नहीं बनते, वे तब गहरे होते हैं, जब समाज किसी की जिम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी मान ले। जब कई गांव एक साथ खड़े होकर किसी निर्धन बेटी के भविष्य को संवारने का संकल्प लें, तो वह केवल विवाह नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का उत्सव बन जाता है।छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के ग्राम बघेरा स्थित बाबा मरसपोटा धाम में यही भाव साकार हो रहा है, जहां वर्ष 2018 से अब तक 32 निर्धन कन्याओं के विवाह कराकर समाज ने यह साबित किया है कि सामूहिक संवेदना ही सशक्त समाज की सबसे मजबूत नींव होती है।

राजनांदगांव की अनूठी संस्कृति

मां काली मंदिर परिसर में होने वाले इन विवाहों में कोई रस्म अधूरी नहीं रहती। हल्दी, मेहंदी, बारात, जयमाला, फेरे और भोज- प्रत्येक परंपरा उसी गरिमा के साथ निभाई जाती है, जैसे किसी पिता द्वारा अपनी बेटी की शादी में की जाती है।

आसपास के आठ गांवों के ग्रामीण और किसान मिलकर प्रत्येक कन्या के विवाह पर लगभग एक लाख रुपये तक का खर्च स्वयं उठाते हैं। विवाह से पहले सगाई, कन्या की इच्छाओं का सम्मान, विवाह के बाद गोदभराई जैसी रस्में भी मंदिर समिति की निगरानी में संपन्न कराई जाती हैं। यह सहभागिता समाज को जोड़ने वाली वह डोर है, जो रिश्तों को औपचारिकता से आगे ले जाती है।

बाबा मरसपोटा धाम वर्ष भर सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बना रहता है। नवरात्र, सावन, गणेशोत्सव, महाशिवरात्रि और कन्या विवाह सहित लगभग 101 दिन प्रसादी भंडारे आयोजित होते हैं।

मंदिर परिसर में स्थापित हनुमान, मां महाकाली, नंदी महाराज, ज्योतिर्लिंग, शनि देव, कछुआ और गणपति की भव्य प्रतिमाएं इसे तीर्थ स्वरूप देती हैं। समिति के सदस्य और गांव के जागरूक लोग प्रत्येक विवाह को ऐसे निभाते हैं, मानो यह संस्कार उनके अपने घर का हो। यही भाव सामाजिक एकता, भाईचारे और विश्वास की मजबूत इमारत खड़ी करता है।

मेहमानों में बांट दिया जाता है चढ़ावा

कन्या विवाह के दिन कन्या पक्ष की मांग पर सखी-सहेलियों और स्वजन को लाने-जाने का दायित्व मंदिर समिति उठाती है। नि:संतान दंपती भी कन्यादान कर अपनी इच्छाओं को पूरा करते हैं। इसके अलावा, मंदिर में चढ़ावे के रूप में आने वाली साड़ियां, कपड़े और अन्य सामान विदाई की रस्म में भेंट स्वरूप मेहमानों को दिए जाते हैं।

विधवा की सिसकियों से सामाजिक सद्भावना की शुरुआत

बाबा मरसपोटा धाम का इतिहास लगभग 300 वर्ष पुराना है। कहा जाता है कि एक बाघ ने किसी व्यक्ति का शिकार करने के बाद उसकी अतड़ियां जंगल में छोड़ दी थीं, जिसके बाद लोग वहां पूजा-पाठ करने लगे। धीरे-धीरे यह स्थान पूजास्थल के रूप में विकसित हो गया।

2018 में एक विधवा महिला की सिसकियों ने इस सामाजिक सद्भावना की शुरुआत की, जब मंदिर समिति ने उसकी बेटी का विवाह कराने का निर्णय लिया। इस प्रकार बाबा मरसपोटा धाम ने निर्धन कन्याओं के लिए एक नई आशा की किरण प्रस्तुत की है।

इस पहल को कन्या विवाह योजना का नाम दिया गया है, जिसमें सभी परंपराओं का पालन किया जाता है ताकि किसी निर्धन कन्या को अपनी स्थिति के कारण कोई कमी न महसूस हो।


CG City News

Related Articles

[td_block_social_counter facebook="tagdiv" twitter="tagdivofficial" youtube="tagdiv" style="style8 td-social-boxed td-social-font-icons" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjM4IiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJwb3J0cmFpdCI6eyJtYXJnaW4tYm90dG9tIjoiMzAiLCJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBvcnRyYWl0X21heF93aWR0aCI6MTAxOCwicG9ydHJhaXRfbWluX3dpZHRoIjo3Njh9" custom_title="Stay Connected" block_template_id="td_block_template_8" f_header_font_family="712" f_header_font_transform="uppercase" f_header_font_weight="500" f_header_font_size="17" border_color="#dd3333"]

Latest Articles

error: Content is protected !!