ऑपरेशन सिंदूर के दौरान खराब मौसम में कैसे पूरा हुआ था ऑपरेशन? पढ़े अनसुनी कहानी

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ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के ठिकानों पर 24 मिसाइलें दागीं। खराब मौसम और कॉकपिट में तकनीकी खराबी जैसी चुनौतियों के बावजूद, जांबाज पायलटों ने अपनी जान जोखिम में डालकर मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

 चार दिन चले ऑपरेशन सिंदूर में जांबाज भारतीय वायुसैनिकों ने महज 25 मिनट में 24 मिसाइलें दागकर पाकिस्तान और पीओजेके के कई ठिकानों को मटियामेट कर दिया था।

लेकिन कठिन लक्ष्य को सफलतापूर्वक साधने में हमारी वायुसेना के पायलटों ने नासिर्फ जान का जोखिम उठाया बल्कि उनके सामने बेहद खराब मौसम और कॉकपिट में तकनीकी खामियों की भी चुनौतियां आईं। लेकिन जांबाज पायलटों ने पाकिस्तानी रडारों की पकड़ में आने से बचते हुए अपनी वीरता और युद्धकौशल से पाकिस्तानी आसमान को अपने धमाकों से सिंदूरी कर दिया।

सोमवार को जारी पुस्तक ”द स्काई वारियर्स : ऑपरेशन सिंदूर अनवील्ड” भारतीय वायु सेना की पाकिस्तान के अंदर गहरे हमलों की थर्रा देने वाली अब तक की अनसुनी कहानियां बताती है।

वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विष्णु सोम ने अपनी किताब में भारतीय जाबांजों की दास्तां सुनाई है। कॉकपिट के अंदर का हाल कुछ सबसे खतरनाक घंटों को परिभाषित करता है। सात मई, 2025 की मध्य रात्रि के बाद बारिश और घने बादलों को चीरते हुए सुखोई-30 एमकेआइ और राफेल युद्धक विमानों से भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी हवाई अड्डों के चीथड़े उड़ा दिए थे।

ग्रुप कैप्टन कुणाल कालरा ने अपने सुखोई-30 एमकेआइ को पाकिस्तान में एक लक्ष्य की ओर उड़ाया, जो बिजली, अशांति और बारिश से भरे ऊंचे बादलों के बीच नेविगेट कर रहा था। भारतीय लड़ाकू विमानों ने सीमा के पार लॉन्च स्थिति में प्रवेश किया। फिर कालरा के कॉकपिट में अचानक एक लाल मास्टर चेतावनी लाइट जल गई और एक स्वचालित चेतावनी आवाज ने विमान में एक विद्युत प्रणाली की खराबी का संकेत दिया। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी चेतावनी के कारण पायलट को मिशन को छोड़कर वापस लौटना पड़ता, लेकिन कालरा ने आगे बढ़ने का निर्णय लिया। खतरा बड़ा था।

पाकिस्तानी रडार सक्रिय थे और दुश्मन की मिसाइलें बिना किसी चेतावनी के साथ आ सकती थीं। लेकिन खराब मौसम और तकनीकी खराबी के बावजूद उन्होंने अपने निर्धारित लांन्च बिंदु तक पहुंचने में सफलता हासिल की। लेकिन दूसरी मिसाइल दागने से पहले उनके विमान में एक और समस्या हुई।

दुश्मन के रडार के उनके सुखोई पर लॉक होने का खतरा बढ़ रहा था। कालरा को प्रणाली को रीसेट करने के लिए पांच मिनट और लगने थे। अगर वह समय से दोबारा लांन्च नहीं कर पाते तो निश्चित रूप से उन्हें वापस लौटना पड़ता। सिस्टम सफलतापूर्वक रीसेट हो गई और कालरा ने दुश्मन के हवाई क्षेत्र से अपने विमान को मोड़ने से पहले दूसरे मिसाइल को दागने में सफलता हासिल की।

अंतिम चरण में जब भारतीय वायुसेना पाकिस्तानी सैन्य विमानन के प्रमुख ठिकानों को निशाना बना रहा थी, ग्रुप कैप्टन मानव भाटिया एक स्क्वाड्रन का नेतृत्व कर रहे थे जिसमें राफेल विमान भी उड़ान भर रहा था। उनके सुखोई विमान में सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल थी।

सामने के कॉकपिट में स्क्वाड्रन के सबसे युवा पायलट में से एक 27 वर्षीय फाइटर पायलट था जिसने ब्रीफिंग के दौरान कई बार मिशन का अभ्यास किया था। दो दशकों का अनुभव रखने वाले भाटिया ने तय कर लिया था कि युवा पायलट को मिसाइल दागनी होगी। जैसे ही सुखोई लांच स्थिति पर पहुंचा, उनके आदेश पर युवा पायलट ने ट्रिगर दबाया। ब्रह्मोस मिसाइल विमान से उड़कर लक्ष्य को भेद गई।


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