बस्तर में महुआ और लघु वनोपज पर निर्भरता के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर है, जिससे माओवादी प्रभाव भी बढ़ा। इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बोधघाट परियोजना इस स्थिति को बदल सकती है।
HighLights
- बोधघाट परियोजना बस्तर की कमजोर ग्रामीण अर्थव्यवस्था बदलेगी।
- सात लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई, बिजली उत्पादन संभव।
- परियोजना 60 साल से लंबित, पुनर्वास बड़ी चुनौती।
बस्तर के जंगलों में महुआ की महक फैली हुई है। सुबह होते ही आदिवासी महिलाएं और बच्चे टोकरी लेकर पेड़ों के नीचे गिरे फूल बीनने निकल पड़ते हैं। महुआ कई परिवारों के लिए नकदी का बड़ा सहारा है।
कुछ महीनों बाद बारिश आएगी और खेतों में धान, कोदो व कोसरा बोया जाएगा। फसल कटने के बाद खेत फिर खाली हो जाएंगे और ग्रामीणों के हाथ भी। यही कारण है कि प्रकृति से संपन्न होने के बावजूद बस्तर का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर है। यहां की खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। ग्रामीणों की आय का बड़ा हिस्सा महुआ, तेंदूपत्ता और अन्य लघु वनोपज पर निर्भर है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की यही कमजोरी लंबे समय तक इस इलाके में माओवादी प्रभाव की बड़ी वजह रही। ऐसे में इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बोधघाट परियोजना इस स्थिति को पूरी तरह बदल सकती है। यदि यह परियोजना सफल होती है, तो बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे जिलों में करीब सात लाख हेक्टेयर भूमि को पानी मिल सकता है।
60 साल बाद भी अधूरी है परियोजना
इंद्रावती नदी पर सिंचाई परियोजनाओं की परिकल्पना 1960 में की गई थी। 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बोधघाट परियोजना की आधारशिला रखी थी। इसके लिए केंद्र सरकार ने विश्व बैंक से 300 करोड़ रुपये का ऋण लिया था, लेकिन वन एवं पर्यावरण संबंधी आपत्तियों व प्रभावित लोगों के विरोध के चलते 1986 में परियोजना रोक दी गई।
बोधघाट पर राजनीति हावी, इसलिए रफ्तार सुस्त
राज्य सरकार ने बोधघाट परियोजना को नए स्वरूप में आगे बढ़ाने की पहल की है, लेकिन 52 जनजातीय गांवों के पुनर्वास की चुनौती के कारण परियोजना की रफ्तार सुस्त है। राजनीतिक दलों के नेता खुलकर पहल करने से बचते दिख रहे हैं। प्रस्ताव के अनुसार, बोधघाट को बहुउद्देशीय डैम के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे ¨सचाई के साथ बिजली उत्पादन भी संभव होगा।
बस्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में होगा बड़ा बदलाव
यदि यह परियोजना समय पर पूरी हो जाती, तो दक्षिण बस्तर की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव हो सकता था। बस्तर की तुलना यदि पड़ोसी राज्य तेलंगाना और ओडिशा से की जाए, तो अंतर साफ दिखाई देता है। इन राज्यों में जल प्रबंधन और सिंचाई योजनाओं के कारण कृषि उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि हुई है। इसके विपरीत, बस्तर में खेती आज भी मानसून पर निर्भर है।
बोधघाट परियोजना की प्रमुख बातें
- परियोजना स्वरूप : बहुद्देशीय बोधघाट डैम + इंद्रावती-महानदी नदी जोड़ो योजना
- स्थान : इंद्रावती नदी, दंतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र के पासकुल
- अनुमानित लागत : लगभग 49,000 करोड़ रुपये
- बोधघाट बांध लागत : करीब 29,000 करोड़ रुपये
- नदी जोड़ो योजना लागत : करीब 20,000 करोड़ रुपये
- बिजली उत्पादन क्षमता : लगभग 125 मेगावाट
- सिंचाई क्षमता : 3.78 लाख हेक्टेयर (बोधघाट), 3 लाख हेक्टेयर (नदी लिंक)
- कुल संभावित सिंचाई : लगभग सात लाख हेक्टेयर भूमि


