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Sunday, November 30, 2025

अपने ही घर में उपेक्षित छत्तीसगढ़ी,28 नवंबर छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस

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CG City News

छत्तीसगढ़ी को यदि देश की सबसे मधुर एवं आत्मीय भाषा शैली की संज्ञा दी जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। राज्य गठन के एक दशक पश्चात छत्तीसगढ़ी को मुकम्मल स्थान न मिल पाना आम छत्तीसगढ़ि‌यों के लिए पीड़ादायक है। हालांकि अब तक के सभी सरकारों ने छत्तीसगढ़ी भाषा के संवर्धन एवं प्रोत्साहन हेतु अनेकानेक योजनाएँ लागू की है। सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का गठन किया गया है तथा छत्तीसगढ़ी साहित्य एवं साहित्यकारों को हर संभव मदद भी दी जा रही है, छत्तीसगढ़ी शब्दकोश की भी रचना की गई है लेकिन केवल शासन तंत्र के ही बलबूते छत्तीसगढ़ी का संपोषण एवं लोकव्यापीकरण संभव नहीं है, इस दिशा में छत्तीसगढ़ के आम वाशिंदों की भी महति जिम्मेदारी अपेक्षित है।

राज्य गठन के शुरूवाती वर्षों में छत्तीसगढ़ी ने व्यापक लोकप्रियता एवं उपस्थिति हासिल की थी, उस दौर में सत्ता के गलियारे से लेकर नुक्कड़ तक छत्तीसगढ़ी ने अपनी अच्छी-खासी धाक जमाई थी। राजनेताओं से लेकर कस्बाई स्तर के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने दैनंदिनी बोलचाल में छत्तीसगढ़ी अपना ली थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रभाव मध्यम पड़ता गया। मजेदार तथ्य यह कि उस दौर के कई राजनेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों एवं व्यवसायियों को छत्तीसगढ़ी बोलते अथवा सीखते देखा गया था।

देश के सभी प्रांतों की अपनी प्रांतीय अथवा आंचलिक भाषा है, तथा ज्यादातर प्रदेशवासी आपसी वार्तालाप आंचलिक अथवा प्रांतीय भाषा में ही करते हैं, इन तबकों में उस राज्य के राजनेता, अफसर, व्यापारी एवं आम नागरिक शामिल है। भले ही इन राज्यों में राजकीय एवं न्यायालयीन कार्यकलाप अंग्रेजी अथवा हिंदी में संपादित होते हों। यहां तक कि अन्य प्रदेशों से आए हुए अप्रवासी लोग भी उस राज्य की ही आंचलिक भाषा एवं संस्कृक्ति में रच-बस जाते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में राजभाषा छत्तीसगढ़ी के साथ ऐसा परिलक्षित नहीं होता। कभी-कभी तो यह भी अनुभव होता है कि आम छत्तीसगढ़िया जो कि दशकों से इस प्रदेश का निवासी है, वह भी छत्तीसगढ़ी बोलने में हिचकता अथवा परहेज करता है, और इसभाषा को पिछड़ेपन की दुरूह भाषा समझता है। यह छय अपराधबोध ही छत्तीसगढ़ी के उन्नति के लिए बाधक है। राज्य गठन के 17 वर्षों बाद भी छत्तीसगढ़ी भाषा का अपने हो राज्य में संरक्षण और संवर्धन नहीं होना अत्यंत पीड़ादायक है। यह भी सच है कि निजभाषा के प्रति उपेक्षात्मक रवैये के लिए छत्तीसगढ़वासी ही जिम्मेदार है तथा इस विशय में विचार मंथन आवश्यक है।

बहरहाल छत्तीसगढ़ में संस्कृति एवं लोककलाओं की समृद्ध परंपरा है, छत्तीसगढ़ी इनकी आत्मा है। प्रदेश के लोकगीत, लोकनृत्य, लोक खेल, परंपरा एवं रीति-रिवाज छत्तीसगढ़ी के ही कारण सरस है। यदि इनका प्रदर्शन किसी अन्य भाषा में किया जाए तो ये परंपरायें एवं लोककला अपनी जीवंतता एवं आत्मीयता खो देंगी। पंडवानी, सुआनाचा, ददरिया, गम्मत, राउतनाचा, पंथीनाचा, जसगीत की राश्ट्रीय ख्याति अथवा लोकप्रियता छत्तीसगढ़ी के ही कारण हैं।

अंचल के कई प्रसिद्ध आध्यात्मिक प्रवचनकारों एवं साहित्यकारों के आध्यात्मिक संदेश एवं गीत, कविता, साहित्य, छत्तीसगढ़ी भाषा के कारण ही प्रसिद्धि एवं लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा है। इनमें स्व. स्वामी आत्मानंद, संत पवन दीवान, स्व. डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा, स्व. रामचंद्र देशमुख सहित लक्ष्मण मस्तुरिया, तीजन बाई, स्व. देवदास चंजारे, डॉ. सुरेन्द्र दुबे, रामेश्वर वैष्णव आदि अनेक ख्याति प्राप्त लोग हैं, जिनकी पहचान उनके कृतित्व में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग है। लेकिन आज के तथाकथित अभिजात्य छत्तीसगढ़ियों का अपनी मातृभाषा के प्रति बेरूखी एवं उपेक्षात्मक रवैया निष्वय ही पीड़ादायक है।

विचारणीय तथ्य यह है कि देश के विकसित राज्य गुजरात, महाराश्ट्र, पंजाब, हरियाणा में इन राज्यों के मूल एवं अप्रवासी निवासी अपने प्रादेशिक अथवा आंचलिक भाषा का प्रयोग पूर्ण आत्मविश्वास एवं अधिकार के साथ करते हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि दक्षिण राज्यों जहाँ के राजनीतिक दलों ने भाषा को ही राजनीतिक हथियार बनाकर अपनी स्वार्थसिद्धि का प्रयास किया था उन राज्यों के आम नागरिकों ने भी अपने मातृभाषा के साथ-साथ हिन्दी को अंगीकार किया है। प्रांतीय भाषा के प्रति कई राज्यों में अतिरेक भी देखा गया है कुछ समय पूर्व महाराष्ट्र के कतिपय क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा मराठी के प्रयोग हेतु जारी दबावपूर्ण एवं आतंकपूर्ण फरमान किसी भी तरह उचित नहीं है। अन्य प्रांतीय भाषा जैसे उड़िया, मराठी, भोजपुरी, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली, गढ़‌वाली, असमी, कनड़, तेलगू, मलयाली अपने राज्य में प्रभावी भूमिका में है लेकिन राज्य में

छत्तीसगढ़ी की अवहेलना टीस पैदा करती है। बहरहाल, ‘जब जागे तब सवेरा’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए प्रदेश के सभी राजनेताओं एवं छत्तीसगढ़ी मूल के अभिजात्य वर्गों जिसमें अधिकारी, व्यापारी, उद्योगपति एवं आम नागरिक शामिल है से यह अपेक्षा है कि वे अपने दैनंदिनी वार्तालापों में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग करें। इसके अलावा पाठ्यपुस्तकों में भी छत्तीसगढ़ी भाषा का समावेश किया जावे।

प्रदेश में छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्माण को प्रोत्साहित भी किया जाए। छत्तीसगढ़ी के स्वावलंबन एवं संवर्धन के लिए यह भी अपेक्षा है कि प्रदेश के विधानसभा की देनदिनी कार्रवाईयां छत्तीसगढ़ी में ही संपादित की जाए। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्थानीय भाषा भावनात्मक संप्रेषण का उत्तम साधन है। निजभाषा के प्रगति से ही राज्य के प्रगति एवं समरसता तथा सहिष्णुता में बढ़ोत्तरी होगी। छत्तीसगढ़ी को पिछड़ेपन अथवा दब्बूपन की भाषा होने के मिथक को तोड़ना ही

छत्तीसगढ़ महतारी के साथ सच्चा न्याय होगा। (लेखक आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में लेकर है)


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