रायपुर:
छत्तीसगढ़ की सियासत से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में गुरुवार को बड़ा फैसला सामने आया। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को NCP नेता रामावतार जग्गी की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है। इस फैसले ने राज्य की राजनीतिक हलचल को एक बार फिर तेज कर दिया है।
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए पहले के बरी किए गए निर्णय को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अमित जोगी की भूमिका साबित होती है, इसलिए उन्हें न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना होगा।
यह मामला वर्ष 2003 का है, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता रामावतार जग्गी की 4 जून को हत्या कर दी गई थी। उस समय अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री थे, जिससे यह मामला शुरू से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना रहा। प्रारंभिक जांच राज्य पुलिस ने की थी, लेकिन बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया।
CBI ने अपनी जांच के बाद अमित जोगी समेत कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, 31 मई 2007 को रायपुर की ट्रायल कोर्ट ने अमित जोगी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ CBI ने उच्च न्यायालय में अपील की, लेकिन 2011 में हाई कोर्ट ने देरी का हवाला देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया था।
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब पिछले वर्ष नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह CBI की अपील पर दोबारा विचार करे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इस मामले में सुनवाई फिर से शुरू हुई और अब हाई कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए अमित जोगी को दोषी करार दिया है।
इस फैसले के बाद अमित जोगी के सामने अब कानूनी विकल्प सीमित रह गए हैं। वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करना अनिवार्य होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले का असर आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल, इस मामले पर सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की संभावित अगली सुनवाई और अमित जोगी की कानूनी रणनीति पर टिकी हैं।

