भारत में लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व माने जाने वाले चुनावों की घोषणा होते ही राजनीतिक माहौल गरमा जाता है। वर्ष 2026 में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा के बाद भी ऐसा ही देखने को मिल रहा है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी कार्यक्रम में जहां मतदान की अवधि को कम किया गया है, वहीं मतगणना में अपेक्षाकृत देरी होने के कारण विपक्ष ने कई सवाल उठाए हैं।
निर्वाचन आयोग ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से चुनाव कार्यक्रम की जानकारी दी। इस कार्यक्रम के अनुसार पांच राज्यों में मतदान की पूरी प्रक्रिया लगभग 20 दिनों के भीतर पूरी कर ली जाएगी। हालांकि अंतिम मतदान और मतगणना के बीच पांच दिन का अंतर रखा गया है, जो पिछली बार के मुकाबले अधिक है।
कम चरणों में चुनाव कराने का फैसला
इस बार चुनाव आयोग ने मतदान चरणों की संख्या कम रखने का निर्णय लिया है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में जहां लगभग एक महीने की अवधि में आठ चरणों में मतदान कराया गया था, वहीं इस बार मतदान को कम दिनों में पूरा करने की योजना बनाई गई है।
पहला मतदान 9 अप्रैल को होगा, जबकि दूसरा चरण 23 अप्रैल को आयोजित किया जाएगा। इसके बाद अंतिम मतदान 29 अप्रैल को होगा। इस प्रकार पूरे मतदान कार्यक्रम को लगभग 20 दिनों के भीतर समेट दिया गया है।
चुनाव आयोग का मानना है कि कम चरणों में मतदान कराने से प्रशासनिक व्यवस्थाएं सरल हो जाती हैं और सुरक्षा बलों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
मतगणना में पांच दिन की देरी
हालांकि मतदान अवधि कम होने के बावजूद मतगणना को लेकर एक नया बदलाव देखने को मिला है। इस बार अंतिम मतदान और मतगणना के बीच पांच दिन का अंतर रखा गया है।
पिछले चुनावों में यह अंतर अपेक्षाकृत कम था। उदाहरण के लिए वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में अंतिम मतदान के तीसरे दिन ही मतों की गिनती शुरू कर दी गई थी।
इस बार मतगणना 29 अप्रैल के पांच दिन बाद की जाएगी। इससे राजनीतिक दलों और विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर मतगणना में इतनी देरी क्यों की जा रही है।
विपक्ष ने उठाए सवाल
चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। कई नेताओं ने आरोप लगाया कि राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव कार्यक्रम तैयार किया गया है।
कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि हाल के समय में देश में एलपीजी संकट और महंगाई जैसे मुद्दों को लेकर जनता में नाराजगी बढ़ी है। ऐसे में भाजपा को चुनाव प्रचार के लिए अधिक समय देने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम बनाया गया है।
विशेष रूप से पश्चिम बंगाल को लेकर विपक्ष ने अधिक सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि वहां राजनीतिक रूप से स्थिति संवेदनशील है, इसलिए चुनाव प्रक्रिया को इस तरह से डिजाइन किया गया है।
चुनाव आयोग का पक्ष
इन आरोपों के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि चुनाव कार्यक्रम तय करते समय कई प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
उन्होंने कहा कि चरणों की संख्या कम करने का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को सरल बनाना था। साथ ही सुरक्षा बलों की उपलब्धता, परीक्षाओं का समय और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं को भी ध्यान में रखा गया।
चुनाव आयोग के अनुसार मतगणना की तारीख तय करने में भी लॉजिस्टिक और तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखा गया है।
पिछली चुनाव प्रक्रिया से तुलना
अगर 2021 के विधानसभा चुनावों की बात करें तो उस समय मतदान लगभग एक महीने तक चला था। कुल आठ चरणों में मतदान कराया गया था और अंतिम मतदान के तीन दिन बाद मतगणना शुरू कर दी गई थी।
इस बार मतदान चरण कम हैं, लेकिन चरणों के बीच का अंतर अधिक है। उदाहरण के लिए पहले और दूसरे चरण के बीच लगभग दो सप्ताह का अंतर रखा गया है।
इसी कारण से चुनाव प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
लोकतंत्र में पारदर्शिता की जरूरत
चुनाव किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला होते हैं। इसलिए चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखना बेहद जरूरी है।
राजनीतिक दलों के सवालों के बीच चुनाव आयोग के सामने यह चुनौती भी है कि वह अपनी प्रक्रिया को स्पष्ट तरीके से जनता के सामने रखे ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
आने वाले दिनों में चुनाव प्रचार के साथ-साथ चुनाव कार्यक्रम को लेकर भी राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना है।


