07 अप्रैल 2026
नई दिल्ली
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी मेडिकल प्रमाण पत्र, विशेषकर विकलांगता प्रमाण पत्र की वैधता तय करने का अधिकार उपखंड दंडाधिकारी (एसडीएम) को नहीं है। कोर्ट ने इस संबंध में दिए गए एसडीएम के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि यह अधिकार केवल सक्षम चिकित्सा बोर्ड के पास ही निहित है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि राजस्व अधिकारी न तो चिकित्सा विशेषज्ञ होते हैं और न ही उन्हें मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी प्रमाण पत्रों की प्रमाणिकता पर निर्णय लेने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए और चिकित्सा मामलों में विशेषज्ञ संस्थाओं की राय ही अंतिम मानी जाएगी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला महासमुंद जिले के सहायक शिक्षक लखन बिहारी पटेल से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2010 में विकलांगता श्रेणी के तहत नियुक्ति मिली थी। जिला मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 45.4 प्रतिशत श्रवण बाधित प्रमाणित किया था।
बाद में दिसंबर 2017 में पारिवारिक भूमि विवाद के चलते उनके भाई ने आरोप लगाया कि उन्होंने फर्जी विकलांगता प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल की है। इस शिकायत के आधार पर कलेक्टर ने एसडीएम (राजस्व) को जांच के निर्देश दिए।
एसडीएम ने 13 अगस्त 2020 को अपने आदेश में यह दावा किया कि संबंधित शिक्षक ने धोखाधड़ी कर प्रमाण पत्र प्राप्त किया है और उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की सिफारिश कर दी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एसडीएम की जांच प्रक्रिया में कई कानूनी खामियां पाईं। न्यायालय ने कहा कि विकलांगता का निर्धारण और उसकी सत्यता की जांच केवल चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा ही की जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि समय के साथ किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति में बदलाव होना स्वाभाविक है और इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पहले प्राप्त प्रमाण पत्र फर्जी था।
आदेश पर रोक, राहत बरकरार
अंततः कोर्ट ने एसडीएम द्वारा पारित आदेश पर रोक लगा दी और स्पष्ट किया कि बिना सक्षम मेडिकल बोर्ड की पुष्टि के किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं है।
क्या है इस फैसले का महत्व?
इस निर्णय को प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। इससे स्पष्ट हो गया है कि चिकित्सा से जुड़े मामलों में गैर-विशेषज्ञ अधिकारियों की भूमिका सीमित है। साथ ही, यह फैसला उन लोगों के लिए भी राहत लेकर आया है, जो बिना उचित जांच के प्रशासनिक कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे के लिए एक मजबूत मिसाल बनेगा और चिकित्सा प्रमाण पत्रों की जांच में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा।


