जलते अंगारों में चलकर हुईं रस्में पूरी, दशकों से चली आ रही परंपरा

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Raigarh

रायगढ़ जिले में शादी का पवित्र बंधन सिर्फ सात फेरों से नही बल्कि ढोल नगाडों के गंूज में नये दुल्हा-दुल्हन को जलते हुए अंगारों में चलाकर पिछले कई दशकों से यह परंपरा निभाई जाती है। इस अनोखी परंपरा न केवल गांव में बल्कि पूरे जिले में चर्चा का विषय बन चुका है। रायगढ़ जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर स्थित बिलासपुर गांव में अनोखी शादी की परंपरा पिछले कई दशकों से चली आ रही है। घर के मुखिया महेत्तर राठिया ने बताया कि जयप्रकाश राठिया घर का सबसे छोटा लड़का है, उसके बड़े भाई के अलावा तीन बहनों की शादी हो चुकी है। उन्होंने बताया कि राठिया परिवार के गंधेल गोत्र के लोग जब शादी करके दुल्हन घर लाते हैं, तब घर के देवी देवताओं की पूजा अर्चना करके शादी के लिये सजाए गए मंडप में अंगारा बिछाकर दुल्हा – दुल्हन के अलावा परिवार के अन्य सदस्य चलकर इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि दुल्हन घर से विदाई के बाद से दुल्हा – दुल्हन के अलावा परिवार के कुछ सदस्यों का उपवास शुरू हो जाता है, इस दौरान वे लोग पानी तक ग्रहण नही करते। इस शादी को देखने गांव के लोगों के अलावा दूसरे गांव से भी लोग भारी संख्या में पहुंचते हैं।
घर के मुखिया पर देवता सवार
इस अनोखी शादी की परंपरा के दौरान मंडप में बकरे की बलि देते ही घर के मुखिया पर देवता सवार हो जाता है और फिर वह नाचते-झुमते जलते हुए अंगारो को मंडप पर बिछाना शुरू कर देता है। जिस पर वह स्वयं, दुल्हा, नई दुल्हन के अलावा परिवार के अन्य सदस्य नंगे पैर चलकर फेरे लेते हैं इसके बावजूद उनके पैरों में जरा भी जख्म नही होता, जो कि अपने आप में आश्चर्य की बात है।

परिवार के सदस्य रहते हैं उपवास
राठिया परिवार के सदस्यों ने बताया कि परिवार के कई सदस्य आज सुबह से उपवास हैं। दुल्हन को अपने घर लाने के बाद घर के बाहर पहले एक बकरे की बलि देने के बाद बकरे की खून से तिलक लगाकर दूल्हा- दुल्हन को घर में प्रवेश कराया गया, उसके बाद दुल्हे के मंडप के नीचे देवी देवताओं की पूजा अर्चना करके दूसरे बकरे की बलि देने के बाद घर के कई सदस्यों ने अंगारों में चलने की परंपरा को निभाया।

कई साल से चली आ रही परंपरा
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बिलासपुर गांव की जनसंख्या तकरीबन 11 सौ के आसपास है और इस गांव में राठिया परिवार के गंधेल गोत्र के दो ही परिवार हैं। उनका कहना है कि वे लोग अपने बचपन से देखते आ रहे हैं जब भी इस परिवार में शादी होती है, दुल्हा, दुल्हन और परिवार के कई सदस्य अंगारों में चलकर इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।

दी जाती है दो बकरों की बलि
शादी के बाद दूल्हा जब दुल्हन लेकर अपने गांव लौटता है, तब उन्हें घर के बाहर ही किसी और की परछी में घंटों तक भूखे प्यासे ही रुकाया जाता है, जिसके बाद बकरे की बलि देकर खून से तिलक लगाकर दुल्हा और नई दुल्हन को घर में प्रवेश कराया जाता है। इस अनोखी परंपरा को देखने दूसरे गांव से भी लोग भारी संख्या में पहुंचते हैं।

परंपरा निभाना क्यों जरूरी
हमारे संवाददाता ने राठिया परिवार के सदस्यों से इस अनोखी परंपरा को कई दशकों से आज तक मनाने के संबंध में पूछने पर उन्होंने बताया कि इस परंपरा को नहीं मनाने पर उनके घर के देवी देवता नाराज हो जायेंगे और परिवार में कुछ अनिष्ठ हो सकता है। इस लिहाज से उनका पूरा परिवार यह परंपरा निभाते आ रहा है और आगे भी निभाते रहेंगे।


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