बलरामपुर। एक ओर सरकार वनों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की बात करती है, वहीं दूसरी ओर बलरामपुर जिले के सेमरसोत अभ्यारण्य क्षेत्र में बेशकीमती सागौन के पेड़ों की अवैध कटाई और तस्करी का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थानीय लोग इसे दक्षिण भारतीय फिल्म ‘पुष्पा’ से तुलना कर रहे हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म में चंदन की तस्करी दिखाई गई थी, जबकि यहां हकीकत में सागौन के घने जंगल उजाड़े जा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की मौन स्वीकृति या लापरवाही के बिना इतनी बड़ी कार्रवाई संभव नहीं हो सकती। रात के अंधेरे में अत्याधुनिक मशीनों से सागौन के पेड़ गिराए जा रहे हैं और कटाई के तुरंत बाद लकड़ियों को ट्रकों में भरकर बाहर भेजने का काम किया जाता है।

जंगलों पर हमला, ग्रामीणों का गुस्सा फूटा
सेमरसोत अभ्यारण्य क्षेत्र के ग्राम कंडा में हाल ही में अवैध कटाई के ताजा मामले सामने आए हैं। जंगल की जमीन पर जगह-जगह ताज़ा ठूंठ दिख रहे हैं, जहां कुछ समय पहले तक विशाल सागौन के पेड़ खड़े थे। ग्रामीणों का कहना है कि – “हम लोग पीढ़ियों से इन जंगलों को बचाते आए हैं। हमें दातुन या वनोपज लाने की भी अनुमति नहीं मिलती, लेकिन रात में सैकड़ों पेड़ कैसे काट दिए जाते हैं, इसकी जानकारी विभाग को क्यों नहीं होती?” ग्रामीणों का कहना है कि गांव में अभी तक बिजली, पानी जैसी सुविधाएं ठीक से नहीं पहुंची हैं, लेकिन अब उनकी आखिरी पूंजी – जंगल – भी तेजी से खत्म किए जा रहे हैं।
रात में होता है पूरा ऑपरेशन, और सुबह सब शांत
सेमरसोत अभ्यारण्य में तैनात कई वनकर्मियों ने माना है कि कटाई की गतिविधि रात में होती है।ग्रामीणों के अनुसार कटाई पूरी तरह रात में होती है। आधुनिक मशीनें पेड़ों को कुछ ही मिनटों में काट देती हैं। लकड़ी तुरंत उठाकर सड़क तक भेज दी जाती है। उनका कहना है कि गांवों में सरकारी आवास न होने के कारण उन्हें मुख्यालय बलरामपुर से आना-जाना पड़ता है, जिससे निगरानी कमजोर पड़ जाती है। लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि – “जब साधारण लकड़ी या वनोपज लाने पर तुरंत कार्रवाई हो सकती है, तो सैकड़ों क्विंटल सागौन रातोंरात कैसे गायब हो जाता है?” कई मामलों में पहले भी जांच बैठाई गई थी, पर नतीजा कभी सामने नहीं आया। जांच रिपोर्टें फाइलों में बंद रहीं और अवैध कटाई का कारोबार पहले की तरह चलता रहा।

अब कार्रवाई की जरूरत, नहीं तो जंगल खत्म हो जाएंगे
सेमरसोत अभ्यारण्य का यह मामला कोई पहला उदाहरण नहीं है। वर्षों से यहां अवैध कटाई का सिलसिला जारी है और हर बार मामले की जांच की घोषणा करके विषय को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। अब सवाल यह है कि – क्या वन विभाग इस बार सच में गंभीर कदम उठाएगा, या फिर जंगल बचाने की लड़ाई ग्रामीणों को अकेले ही लड़नी होगी?





