Peanuts – कच्ची या भुनी मूंगफली? वजन, डायबिटीज और डाइजेशन का पूरा सच – इस article में हम विस्तार से समझेंगे कि मूंगफली को किस रूप में खाना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है।
क्या कच्ची मूंगफली खाना सही है या फिर पानी में भिगोई हुई, उबली हुई या भुनी हुई मूंगफली ज्यादा अच्छा विकल्प है।
इसके साथ ही हम यह भी जानेंगे कि मूंगफली वजन बढ़ाने में मदद करती है या वजन घटाने में, दिन भर में इसकी सुरक्षित मात्रा कितनी होनी चाहिए और सबसे अहम बात किन लोगों को मूंगफली से पूरी तरह दूरी बनाकर रखनी चाहिए। यह सारी जानकारी हम तर्क और वैज्ञानिक आधार के साथ समझेंगे।
मूंगफली को समझने के 4 जरूरी आधार
मूंगफली के फायदे और नुकसान को सही तरीके से समझने के लिए चार बातों को जानना बहुत जरूरी है।
पहला है न्यूट्रिशन, यानी मूंगफली में कौन-कौन से पोषक तत्व मौजूद होते हैं।
दूसरा है प्रिपरेशन, मतलब इसे कच्चा, भिगोकर, उबालकर या भूनकर खाने से इसके पोषण में क्या बदलाव आता है।
तीसरा पहलू है डाइजेशन, यानी मूंगफली पचने में शरीर के लिए कितनी आसान या भारी होती है।
और चौथा है अब्सॉर्प्शन, यानी पचने के बाद यह शरीर पर किस तरह से असर दिखाती है।
कच्ची मूंगफली का न्यूट्रिशन प्रोफाइल
अगर 100 ग्राम कच्ची मूंगफली की बात करें, तो इसमें करीब 50 ग्राम फैट पाया जाता है। इसके अलावा लगभग 16 ग्राम कार्बोहाइड्रेट और 25 ग्राम के आसपास प्रोटीन मौजूद होता है।
अब अगर फैट की क्वालिटी को देखें, तो मूंगफली में मुख्य रूप से दो तरह के फैट पाए जाते हैं – मोनो अनसैचुरेटेड फैटी एसिड और पॉली अनसैचुरेटेड फैटी एसिड।
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मोनो अनसैचुरेटेड फैट शरीर में जाकर ओलिक एसिड में बदलता है, जिसे ओमेगा-9 भी कहा जाता है। यह हेल्दी फैट की कैटेगरी में आता है और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने, खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने और ब्लड शुगर को संतुलित रखने में मदद करता है।
पॉली अनसैचुरेटेड फैट मुख्य रूप से ओमेगा-6 के रूप में पाया जाता है। मूंगफली में ओमेगा-3 लगभग ना के बराबर होता है। ओमेगा-6 शरीर में सूजन से जुड़ी प्रतिक्रियाएं पैदा करता है, जो सीमित मात्रा में फायदेमंद लेकिन ज्यादा मात्रा में नुकसानदायक हो सकता है। यही कारण है कि मूंगफली की मात्रा पर नियंत्रण जरूरी है।
इसके अलावा मूंगफली में थोड़ी मात्रा में सैचुरेटेड फैट भी होता है, जो हार्मोन प्रोडक्शन में सहायक भूमिका निभाता है।
मूंगफली का प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट
मूंगफली का प्रोटीन पूरी तरह कंप्लीट नहीं होता क्योंकि इसमें एक एसेंशियल अमीनो एसिड की मात्रा कम होती है। लेकिन जब इसे फलों या सलाद के साथ खाया जाता है, तो यह कमी पूरी हो जाती है और प्रोटीन ज्यादा असरदार बन जाता है।
कार्बोहाइड्रेट की मात्रा मूंगफली में कम होती है और वह भी अधिकतर फाइबर के रूप में होती है। यही फाइबर पाचन सुधारने और ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करता है। इसी वजह से डायबिटीज के मरीज भी सीमित मात्रा में मूंगफली का सेवन कर सकते हैं।
माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की ताकत
मूंगफली में मैग्नीशियम और फॉस्फोरस अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें मौजूद कॉपर आयरन के अब्सॉर्प्शन को बेहतर करता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में मदद करता है।
थोड़ी मात्रा में विटामिन E भी होता है, जो एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करता है। यह स्किन, बाल, मसल्स और ब्रेन फंक्शन के लिए फायदेमंद होता है। इसके अलावा कई तरह के विटामिन B कॉम्प्लेक्स भी मूंगफली में मौजूद होते हैं।
मूंगफली में मौजूद एंटी-न्यूट्रिएंट्स
इतने सारे फायदे होने के बावजूद मूंगफली में कुछ ऐसे तत्व भी होते हैं जो सावधानी न बरतने पर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
फाइटिक एसिड मिनरल्स के अब्सॉर्प्शन में रुकावट डालता है।
ट्रिप्सिन इनहिबिटर प्रोटीन के सही उपयोग को रोकता है।
ऑक्सालेट किडनी स्टोन की समस्या बढ़ा सकता है।
लैक्टिन पेट की लाइनिंग को इरिटेट कर सकता है।
और सबसे खतरनाक है एफलाटॉक्सिन, जो खराब स्टोरेज की वजह से फंगस के रूप में बनता है और शरीर में जहर जैसा असर करता है।
भिगोई, उबली और भुनी मूंगफली में क्या बदलता है?
जब मूंगफली को 7–8 घंटे पानी में भिगोया जाता है, तो ट्रिप्सिन इनहिबिटर कुछ हद तक कम हो जाता है। इससे प्रोटीन की बायो-अवेलेबिलिटी थोड़ी बढ़ जाती है। फाइटिक एसिड और ऑक्सालेट भी कुछ हद तक घटते हैं, जिससे पाचन आसान हो जाता है।
उबालने या हल्का भूनने पर हीट की वजह से एंटी-न्यूट्रिएंट्स काफी हद तक नष्ट हो जाते हैं और पोषक तत्व ज्यादा आसानी से शरीर में इस्तेमाल हो पाते हैं। लेकिन ज्यादा तापमान या ज्यादा देर तक पकाने से न्यूट्रिशन भी नष्ट हो सकता है। इसलिए संतुलन जरूरी है।
रोज कितनी मूंगफली खानी चाहिए?
नॉर्मल हेल्दी व्यक्ति एक मुट्ठी मूंगफली आराम से खा सकता है।
वजन घटाने वालों के लिए 8–10 दाने पर्याप्त हैं।
वजन बढ़ाने वालों के लिए 40–50 ग्राम तक ली जा सकती है, खासकर फलों के साथ।
लेकिन जरूरत से ज्यादा सेवन करने पर फैट और ओमेगा-6 की अधिकता सूजन, मुंहासे और अन्य समस्याएं पैदा कर सकती है।
किन लोगों को मूंगफली नहीं खानी चाहिए?
पहली स्थिति तब होती है जब मूंगफली में एफलाटॉक्सिन (aflatoxin) मौजूद हो। ऐसी मूंगफली लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
दूसरी स्थिति है मूंगफली एलर्जी। ऐसे लोगों में खाने के 1–2 घंटे के अंदर एलर्जिक रिएक्शन शुरू हो सकता है।
तीसरी स्थिति है जरूरत से ज्यादा मात्रा में सेवन, जिससे वजन और सूजन से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
इतनी ही मात्रा लें जिसे 7–10 दिन में खत्म किया जा सके।
एयरटाइट कंटेनर में ठंडी जगह या फ्रिज में स्टोर करें।
कच्ची मूंगफली को स्टोर करने से बेहतर है पहले हल्का भून लेना।
अगर स्वाद या गंध अजीब लगे तो तुरंत थूक दें, निगलें नहीं।
Conclusion
मूंगफली सही तरीके और सही मात्रा में खाई जाए तो यह बेहद फायदेमंद है। लेकिन लापरवाही से इसका सेवन फायदे की जगह नुकसान भी दे सकता है। इसलिए अपने शरीर की प्रतिक्रिया को समझते हुए इसका इस्तेमाल करें।
आप मूंगफली कैसे खाते हैं-कच्ची, भुनी या भिगोकर?
https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/healthy-diet

