रियाद/इस्लामाबाद:
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सीजफायर के नाजुक माहौल के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने करीब 13,000 सैनिकों और 10 से 18 लड़ाकू विमानों की तैनाती कर दी है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब पाकिस्तान एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की मेजबानी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को मजबूत करने के लिए सऊदी अरब के साथ अपनी सैन्य साझेदारी भी बढ़ा रहा है।
जानकारी के अनुसार, यह तैनाती पिछले वर्ष पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए रणनीतिक रक्षा समझौते के तहत की गई है। इस समझौते में स्पष्ट प्रावधान है कि किसी एक देश पर हमला, दूसरे पर हमला माना जाएगा। ऐसे में मौजूदा हालात को देखते हुए पाकिस्तान ने अपने सैनिकों और वायुसेना संसाधनों को सऊदी अरब भेजकर इस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है।
सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, पाकिस्तानी सैनिकों को देश के पूर्वी क्षेत्र स्थित अब्दुल अजीज एयरबेस पर तैनात किया गया है। इस तैनाती का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच सैन्य समन्वय को बढ़ाना, ऑपरेशनल तैयारी को मजबूत करना और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा एवं स्थिरता सुनिश्चित करना है।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने भी पुष्टि की है कि यह कदम पूरी तरह से रक्षा सहयोग के दायरे में उठाया गया है। उनका कहना है कि तैनात सैनिक और लड़ाकू विमान केवल सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए हैं और किसी आक्रामक कार्रवाई का हिस्सा नहीं हैं।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यह तैनाती ईरान-अमेरिका तनाव की पृष्ठभूमि में काफी महत्वपूर्ण है। हाल के दिनों में ईरान द्वारा सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने की घटनाओं के बाद सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई थीं। ऐसे में पाकिस्तान का यह कदम सऊदी अरब की सुरक्षा को अतिरिक्त मजबूती देने के तौर पर देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने इससे पहले सऊदी अरब को मिसाइल इंटरसेप्टर सिस्टम भी उपलब्ध कराए थे, जिससे संभावित हवाई हमलों को रोका जा सके। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति पर सवाल भी खड़े किए हैं, क्योंकि एक तरफ वह मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, वहीं दूसरी ओर सैन्य तैनाती कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह रणनीति क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने और अपने पारंपरिक सहयोगी सऊदी अरब के साथ संबंधों को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस तैनाती का पश्चिम एशिया की राजनीति और सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ता है।

