लंदन/वॉशिंगटन:
अमेरिका के कड़े विरोध के बाद ब्रिटेन ने चागोस द्वीपसमूह को मॉरीशस को सौंपने से जुड़े प्रस्ताव को फिलहाल टाल दिया है। इस फैसले के केंद्र में हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से अहम डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डा है, जो अमेरिका और ब्रिटेन दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह इस समझौते को तभी आगे बढ़ाएगी, जब उसे अमेरिका का पूरा समर्थन मिलेगा। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की अगुवाई वाली सरकार इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए संसद में कानून लाने की तैयारी कर रही थी, लेकिन अब इसे अगले विधायी एजेंडे से हटा दिया गया है।
सुरक्षा बनी सबसे बड़ी प्राथमिकता
डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डा हिंद महासागर क्षेत्र में पश्चिमी देशों की सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा है। यह बेस लंबे समय से अमेरिका और ब्रिटेन के संयुक्त नियंत्रण में है और इसका उपयोग मध्य पूर्व, एशिया और अफ्रीका में सैन्य अभियानों के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में इसकी सुरक्षा और संचालन को लेकर दोनों देशों के लिए कोई जोखिम उठाना आसान नहीं है।
प्रस्तावित समझौते के तहत ब्रिटेन चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने पर सहमत था, लेकिन डिएगो गार्सिया बेस पर 99 साल की लीज के जरिए नियंत्रण बनाए रखने की योजना थी। इसके बावजूद अमेरिका ने इस व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कीं और इसे रणनीतिक दृष्टि से जोखिमपूर्ण बताया।
ट्रंप ने जताया विरोध
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही इस प्रस्ताव को “बड़ी गलती” करार दे चुके हैं। उनका मानना है कि इस तरह का कदम क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य स्थिति को कमजोर कर सकता है। ट्रंप के इस रुख के बाद दोनों देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं।
कूटनीतिक रिश्तों में दिखा खिंचाव
हाल के घटनाक्रमों ने अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्तों में हल्का तनाव भी पैदा किया है। विशेष रूप से ईरान को लेकर चल रहे सैन्य तनाव के दौरान ब्रिटेन ने अमेरिका-इजरायल के साथ सीधे तौर पर शामिल होने में हिचक दिखाई थी। शुरुआत में ब्रिटेन ने अमेरिकी हमलों के लिए अपने एयरबेस के इस्तेमाल की अनुमति भी नहीं दी थी, हालांकि बाद में सीमित स्तर पर रक्षात्मक सहयोग दिया गया।
आगे क्या?
ब्रिटेन ने संकेत दिया है कि वह वाशिंगटन को मनाने की कोशिश जारी रखेगा और तभी इस समझौते को आगे बढ़ाया जाएगा। फिलहाल चागोस द्वीपसमूह का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन यह साफ है कि डिएगो गार्सिया बेस की सुरक्षा और सामरिक महत्व ही इस पूरे मुद्दे की धुरी बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।

