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Wednesday, April 22, 2026

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ महत्वपूर्ण मोड़ -हिड़मा की मौत से माओवादी बटालियन कमजोर |

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CG City News

माओवादी संगठन की कभी सबसे सशक्त और खूंखार मानी जाने वाली बटालियन नंबर-1 हिड़मा की मौत के बाद तेजी से कमजोर पड़ती दिख रही है। हिड़मा के दौर में जिस अनुशासन, भय और नियंत्रण के लिए यह बटालियन जानी जाती थी, उसे मौजूदा कमांडर बारसे देवा कायम नहीं रख पा रहा है।

हिड़मा के पैतृक गांव पूवर्ती से जुड़े होने के बावजूद देवा लड़ाकों का भरोसा जीतने में विफल रहा है। ताड़मेटला, मिनपा और झीरम घाटी जैसी बड़ी और चर्चित वारदातों को अंजाम देने वाली इस बटालियन का आखिरी बड़ा हमला वर्ष 2021 में टेकुलगुड़ेम में हुआ था, जिसमें 21 जवान बलिदान हुए थे।

बटालियन की सैन्य क्षमता में कमी

इसके बाद से सुरक्षा बलों के निरंतर दबाव, सघन अभियानों और क्षेत्रीय नियंत्रण के चलते बटालियन की सैन्य क्षमता लगातार क्षीण होती चली गई। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि इसके सदस्य अब मुख्यधारा में वापसी का रास्ता अपना रहे हैं।

शुक्रवार को हैदराबाद में बटालियन नंबर-1 के कंपनी कमांडर मड़कम मंगा सहित 11 माओवादियों का समर्पण संगठन के भीतर गहराते नेतृत्व संकट और टूटते मनोबल का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। तेलंगाना में कुल 41 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें से 30 बस्तर क्षेत्र में सक्रिय थे।

समर्पण के बाद बचे 250 सशस्त्र माओवादी

खुफिया सूत्रों के अनुसार, इस समर्पण के बाद प्रदेश में अब लगभग 250 सशस्त्र माओवादी ही शेष रह गए हैं। इनमें बस्तर में लगभग 220 माओवादी, धमतरी-गरियाबांद जिले में 23 और मोहला-मानपुर क्षेत्र में सात माओवादी सक्रिय बताए जा रहे हैं।

इन सशस्त्र माओवादियों के अलावा ग्राम स्तर पर गठित समितियों में सक्रिय कैडरों की संख्या लगभग 400 के आसपास आंकी जा रही है। वर्तमान में बस्तर में बारसे देवा के अलावा पापाराव ही शीर्ष स्तर का बड़ा माओवादी माना जा रहा है। इनके अतिरिक्त डिविजनल कमेटी स्तर पर राहुल पूनेम, दिलीप वेज्जा और सोमड़ू जैसे नाम सक्रिय बताए जाते हैं।

कभी 300 की ताकत और अब सिमटकर 120 पर आई बटालियन नंबर-1

एक समय बटालियन नंबर-1 में एके-47 और एलएमजी जैसे आधुनिक हथियारों से लैस करीब 300 सशस्त्र माओवादी थे। टेकुलगुड़ेम से पूवर्ती और कर्रेगुट्टा की पहाडि़यों तक इनका प्रभाव क्षेत्र था, जहां अब सुरक्षा बलों का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो चुका है।

बढ़ते दबाव के चलते दो वर्ष पहले माओवादियों को बटालियन नंबर-1 की संरचना में भी बदलाव करना पड़ा और बटालियन कई टुकड़ों में बंट गई। लगातार मुठभेड़ों, आत्मसमर्पण और पुनर्वास के बाद अब इस बटालियन में लगभग 120 माओवादी ही शेष बचे हैं।

सुरक्षा बलों के सघन अभियानों और सरकार की प्रभावी नीति से माओवादी संगठन की कमान और मनोबल टूट चुका है। माओवादी ¨हसा को निरर्थक मानकर अब सुरक्षा, सम्मान और बेहतर भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। यह बस्तर में माओवाद के अपरिवर्तनीय पतन का संकेत है। -सुंदरराज पी., आईजीपी बस्तर।


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