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Thursday, April 16, 2026

अच्छी खबर; पॉलीथिनमुक्त होंगे छत्तीसगढ़ के सभी मंदिर

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CG City News

छत्तीसगढ़ के मंदिर होंगे पूर्णतः पॉलीथिनमुक्त : पर्यावरण और आस्था का संगम

 

भारत भूमि प्राचीन काल से ही संस्कृति, अध्यात्म और पर्यावरण संरक्षण की भूमि रही है। यहाँ प्रत्येक धर्म, परंपरा और आस्था में प्रकृति के प्रति श्रद्धा का भाव निहित है। वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और जलवायु को देवत्व का रूप देकर संरक्षण का संदेश दिया गया है। किंतु आधुनिकता और सुविधा की अंधी दौड़ में हम इस मूल दर्शन से दूर होते गए हैं। आज हमारी नदियाँ, नालियाँ, सड़के और मंदिर परिसर तक पॉलीथिन से पटे दिखाई देते हैं। इसी गंभीर समस्या के समाधान हेतु छत्तीसगढ़ राज्य ने एक सराहनीय पहल की है — राज्य के सभी मंदिरों को “पॉलीथिनमुक्त क्षेत्र” घोषित करने का संकल्प।


पहल की शुरुआत :

शनिवार को रायपुर स्थित दूधाधारी सत्संग भवन, मठपारा में “ग्रीन आर्मी छत्तीसगढ़” नामक सामाजिक संगठन द्वारा एक विशेष बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में राज्यभर के प्रमुख मंदिरों के महंत, पुजारी, मंदिर समिति के सदस्य, पर्यावरणविद् तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।
बैठक का प्रमुख उद्देश्य था — मंदिर परिसरों को पूर्णतः पॉलीथिनमुक्त बनाना और जनता में इस संबंध में जागरूकता फैलाना।

बैठक के दौरान सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि अब राज्य के किसी भी मंदिर में श्रद्धालु पॉलीथिन में लिपटी या पैक की गई पूजा सामग्री लेकर नहीं आएँगे। मंदिर प्रबंधन समिति इस नियम का पालन सुनिश्चित करेगी और श्रद्धालुओं से निवेदन करेगी कि वे कपड़े, पत्तों, बांस या पर्यावरणमित्र थैलियों का प्रयोग करें।


संकल्प और घोषणा :

कार्यक्रम के समापन सत्र में सभी उपस्थित संत-महंतों, पुजारियों और श्रद्धालुओं ने “पॉलीथिनमुक्त मंदिर अभियान” का सामूहिक संकल्प लिया।
सभी ने हाथ उठाकर यह प्रतिज्ञा की कि वे स्वयं भी पॉलीथिन का उपयोग नहीं करेंगे, न दूसरों को करने देंगे। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक जागरण का रूप ले चुका है।

महंतों ने कहा —

“मंदिर वह स्थान है जहाँ मनुष्य अपनी आत्मा को शुद्ध करने आता है, ऐसे पवित्र स्थल को प्रदूषण से मुक्त रखना हर भक्त का कर्तव्य है।”


पॉलीथिन का संकट :

पॉलीथिन आज विश्व के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय संकट बन चुकी है। इसका उपयोग आसान और सस्ता होने के कारण यह हर क्षेत्र में फैल चुका है, परंतु इसके दुष्परिणाम अत्यंत भयावह हैं।

  • पॉलीथिन मिट्टी में विघटित नहीं होती, जिससे भूमि की उर्वरता घटती है।

  • यह नालियों को जाम करती है, जिससे जलभराव और गंदगी फैलती है।

  • गायों और पशुओं द्वारा निगले जाने पर यह मृत्यु का कारण बनती है।

  • यह नदियों और तालाबों में फेंकी जाने पर जलजीवों के लिए घातक सिद्ध होती है।

  • मंदिरों में पूजा के बाद बची सामग्री यदि पॉलीथिन में बंधी हो तो वह प्रसाद और फूलों के साथ जल या भूमि में प्रदूषण फैलाती है।

इन कारणों से यह आवश्यक हो गया है कि हम अपने धार्मिक स्थलों से इस प्लास्टिक राक्षस को हटाएँ।


छत्तीसगढ़ की भूमिका :

छत्तीसगढ़ सदैव पर्यावरण-संवेदनशील राज्य रहा है। यहाँ के जंगल, नदियाँ और जनजातीय परंपराएँ प्रकृति से गहराई से जुड़ी हैं। राज्य सरकार ने पहले ही पॉलीथिन पर कई स्तरों पर प्रतिबंध लगाया है, किंतु मंदिरों में इसका पूर्ण उन्मूलन अब तक चुनौती बना हुआ था।
ग्रीन आर्मी छत्तीसगढ़ के इस अभियान से एक नई शुरुआत हुई है। संगठन ने घोषणा की है कि वे मंदिरों में जागरूकता शिविर, पर्यावरण संवाद, और स्वच्छता अभियान चलाएंगे।


जनजागरण अभियान :

संगठन के सदस्यों ने निर्णय लिया कि प्रत्येक प्रमुख मंदिर में “हरि संदेश, हरि स्वच्छता” नामक जनजागरण कार्यक्रम चलाया जाएगा, जिसमें यह बताया जाएगा कि पर्यावरण की रक्षा भी ईश्वर की आराधना का ही एक रूप है।
मंदिरों में सूचना पट्ट लगाए जाएंगे —

“यह मंदिर पॉलीथिनमुक्त क्षेत्र है। कृपया पूजा सामग्री बिना पॉलीथिन लाएँ।”

बच्चों और युवाओं को इस अभियान से जोड़ने के लिए “ग्रीन वालंटियर” समूह बनाए जाएंगे। वे श्रद्धालुओं को वैकल्पिक थैलियाँ बाँटेंगे और पॉलीथिन के दुष्प्रभाव समझाएँगे।


महंतों की भूमिका :

बैठक में प्रमुख मठों के महंतों ने कहा कि धार्मिक नेतृत्व यदि आगे बढ़े तो समाज स्वतः उसका अनुसरण करता है। महंतों ने घोषणा की कि वे अपने मठों में भी पॉलीथिन का उपयोग पूर्णतः बंद करेंगे।
कुछ मंदिरों ने तो यह भी प्रस्ताव रखा कि वे कपास, जूट और बाँस से बनी पर्यावरणमित्र थैलियाँ स्थानीय स्तर पर तैयार करवाएँगे, जिससे गाँव की महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा।


प्रशासनिक सहयोग :

राज्य के पर्यावरण विभाग और नगर निगमों से भी इस अभियान को सहयोग देने की अपील की गई है। मंदिर परिसर में नियमित स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और अपशिष्ट पदार्थों के पृथक्करण की व्यवस्था करने पर बल दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, “ग्रीन सर्टिफिकेट” योजना लागू करने का सुझाव भी रखा गया, जिसके अंतर्गत पॉलीथिनमुक्त मंदिरों को सम्मानित किया जाएगा।


धार्मिक दृष्टिकोण :

भारतीय दर्शन में “स्वच्छता” और “पवित्रता” को ईश्वरीय गुण माना गया है।
“शुचिता ही देवत्व का द्वार है” — यह भावना हमारे वेदों और पुराणों में प्रतिपादित है।
यदि मंदिर के प्रांगण में गंदगी या प्रदूषण होगा तो वह केवल बाहरी अपवित्रता नहीं, बल्कि हमारी आस्था का भी अपमान है।
इसलिए यह अभियान केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि धार्मिक शुद्धता का भी प्रतीक है।


आर्थिक और सामाजिक प्रभाव :

यह अभियान स्थानीय स्तर पर आर्थिक अवसर भी उत्पन्न करेगा।
कपास, जूट, बाँस, पत्तों और कागज़ से बनी पर्यावरणमित्र थैलियाँ बनाने में ग्रामीण महिलाएँ और स्व-सहायता समूह शामिल होंगे।
इससे एक ओर पर्यावरण की रक्षा होगी, वहीं दूसरी ओर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।


युवाओं और विद्यालयों की भागीदारी :

ग्रीन आर्मी छत्तीसगढ़ ने कहा कि आने वाले समय में विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी “मंदिर स्वच्छता एवं पॉलीथिनमुक्ति” विषय पर प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँगी।
बच्चों को बचपन से यह सिखाना आवश्यक है कि ईश्वर की सच्ची आराधना स्वच्छता और संवेदनशीलता में है।


भविष्य की रूपरेखा :

  1. प्रत्येक मंदिर में पॉलीथिन निगरानी समिति का गठन।

  2. स्थानीय निकायों के साथ समन्वय।

  3. पर्यावरण-अनुकूल थैलियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।

  4. मीडिया के माध्यम से जनजागरूकता फैलाना।

  5. राज्य स्तरीय “ग्रीन टेंपल अवार्ड” की स्थापना।


महान उद्देश्य की ओर :

यह अभियान केवल एक राज्य तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे भारत के लिए एक उदाहरण बने — यही उद्देश्य है।
यदि छत्तीसगढ़ जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में मंदिर पॉलीथिनमुक्त बन सकते हैं, तो देशभर में यह आंदोलन एक जनजागरण का रूप ले सकता है।
हम सबका यह दायित्व है कि हम “स्वच्छ मंदिर, स्वच्छ पर्यावरण” के इस संदेश को जन-जन तक पहुँचाएँ।


समापन :

छत्तीसगढ़ के मंदिरों में शुरू हुआ यह अभियान केवल पॉलीथिनमुक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना को स्वच्छ करने की दिशा में एक कदम है।
जब श्रद्धालु अपने आराध्य के चरणों में बिना प्रदूषण के, स्वच्छ भाव से चढ़ावा अर्पित करेगा, तभी उसकी पूजा पूर्ण होगी।
पॉलीथिन का त्याग केवल एक वस्तु का त्याग नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की शुद्धता का प्रतीक है।

आओ, हम सब मिलकर यह संकल्प लें —

“हम अपने मंदिरों को, अपने शहरों को, और अपनी धरती को पॉलीथिनमुक्त बनाएँगे। यही सच्ची पूजा है, यही सच्ची देशभक्ति है।”


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