‘शोक’ का राजनीतिकरण और ‘सिंहासन’ का संस्कार
भारतीय राजनीति की डिक्शनरी में ‘शोक’ शब्द की परिभाषा बदल गई है। अब आँसू पोंछने के लिए रुमाल नहीं, बल्कि शपथ पत्र की जरूरत पड़ती है। परंपराएं कहती हैं कि तेरहवीं तक घर की चौखट नहीं लांघते, लेकिन आधुनिक राजनीति कहती है कि अगर चौखट नहीं लांघी, तो कोई और ‘डिप्टी’ की कुर्सी लांघ जाएगा।
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0 राजनीति का ‘शॉर्टकट’ और ‘सर्कस’
यहाँ मालाएं दो तरह की होती हैं—एक जो तस्वीर पर चढ़ाई जाती है और दूसरी जो जीत के जश्न में पहनी जाती है। कमाल देखिए कि अभी चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई कि कार्यकर्ताओं के नारों की गर्मी ने माहौल गरमा दिया है। पति की विरासत को सँभालने का इससे ‘तेज’ तरीका शायद ही इतिहास ने देखा हो। इसे ‘पॉलीटिकल एफिशिएंसी’ कहें या संवेदनाओं का सूखा, यह तय करना जनता का काम है।
0 तस्वीर बनाम तकदीर
जिस शख्स ने खून-पसीना एक करके पार्टी खड़ी की, वह अब दफ्तर की दीवार पर एक फ्रेम में सिमट गया है। उधर, बाहर आतिशबाजी हो रही है। शायद यह संदेश दिया जा रहा है कि—”साहब गए तो क्या हुआ, मेमसाहब तो आ गईं!” नैतिकता और लोक-लाज को तो बहुत पहले ही राजनीति के ‘मर्जर’ में विलीन कर दिया गया था।
0 वो दूषित और ये रणनीतिज्ञ
जांच की मांग करने वाले ‘दूषित’ कहलाते हैं और शोक के बीच सत्ता की मलाई खाने वाले ‘रणनीतिज्ञ’। इसे ही तो असली लोकतंत्र कहते हैं, जहाँ भावनाओं की ‘एक्सपायरी डेट’ सत्ता की शपथ से पहले ही आ जाती है।

