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Thursday, April 16, 2026

हिट &रन :हड़ताल टल गई,पर यह जानना भी जरूरी है कि क्या है नया प्रावधान,और क्यों लाया गया….

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CG City News

हिट एंड रन का मतलब है तेज और लापरवाही से गाड़ी चलाने के चलते किसी व्यक्ति या संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और फिर भाग जाना। ऐसे में सबूतों और प्रत्यक्षदर्शियों के अभाव के कारण दोषियों को पकड़ना और सजा देना बहुत मुश्किल हो जाता है।

इस पर नया नियम क्या आया है?
जिस नियम को लेकर देश भर में बवाल मचा रहा, और आश्वासन के बाद हड़ताल खत्म की गई है, दरअसल वह हाल ही में संसद से पारित तीन नए कानून का हिस्सा है। आईपीसी की जगह लेने वाली भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 104 में हिट एन्ड रन का जिक्र किया गया है। यह धारा लापरवाही से मौत का कारण के लिए दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान करती है। धारा 104(1) कहती है,’जो कोई भी बिना सोचे-समझे या लापरवाही से कोई ऐसा कार्य करके किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है जो गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में नहीं आता है, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जिसे पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।’ धारा 104(2) उल्लेख करती है, ‘जो कोई भी लापरवाही से वाहन चलाकर किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है, जो गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में आता है और घटना के तुरंत बाद किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना दिए बिना भाग जाता है, उसे किसी भी अवधि के कारावास से दंडित किया जाएगा। जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी देना होगा।’

क्या कहती है- भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (2)
भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (2) का वास्तविक अर्थ भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 में उप-धारा (2) में एक अतिरिक्त प्रावधान पेश करती है जो उन स्थितियों को संबंधित करती है जहां अपराधी घटना के बाद किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट किए बिना घटनास्थल से भाग जाता है। ऐसे मामलों में सजा बहुत कड़ी होती है। इसमें अधिकतम 10 साल की सजा और जुर्माना हो सकता है। दूसरी तरफ अगर किसी व्यक्ति से गलती से एक्सीडेंट होता है, और वो घायल को अस्पताल लेकर जाता है या पुलिस/मजिस्ट्रेट को तुरंत सूचित करता है, तो ये BNS की धारा 106 (1) के अन्तर्गत आएगा, जो जमानती होगा।
पीड़ित को बचाने का उद्देश्य
वर्तमान में हिट एंड रन के मामले, जिसके परिणामस्वरूप लापरवाह और लापरवाह ड्राइविंग के कारण मृत्यु होती है, आईपीसी की धारा 304 (ए) के तहत दर्ज किए जाते हैं, जिनमें अधिकतम 2 साल की कैद की सजा होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में बढ़ती वाहन दुर्घटना के मद्देनजर कानून की अपर्याप्तता पर टिप्पणी की थी। इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए, खंड 106(2) के तहत नया प्रावधान पेश किया गया है जो लंबे समय से लंबित था । धारा 106(2) को हिट एंड रन दुर्घटनाओं को कवर करने और दुर्घटना की तुरंत रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के लिए पेश किया गया है। इसे वर्ष 2019 में मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में पेश किए गए शब्द ‘गोल्डन ऑवर के भीतर पीड़ित को बचाने के उद्देश्य से पेश किया गया है ।
इस धारा से किसे डरना चाहिए ? –
ऐसे वाहन चालक जो एक्सीडेंट के बाद किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को सूचना दिए बगैर भाग खड़े होते हैं और घायल व्यक्ति का ‘गोल्डन ऑवर’ चला जाता है. ऐसे गैर जिम्मेदार वाहन चालकों पर यह कानून प्रभावशील होगा।
0 कानूनी राहत के लिए आखिर क्या करें
यदि किसी चालक से एक्सीडेंट हो जाता है तो वह अपने मोबाइल से डायल 112, पुलिस अधिकारी अथवा मजिस्ट्रेट को सूचना देवे या थाने में स्वयं जाकर सूचना दें ताकि पीड़ित को समय पर इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जा सके। इससे वाहन चालक को भी कानून राहत मिल सकेगी। यहां यह समझना आवश्यक है कि सड़क दुर्घटना से घायल व्यक्ति स्वयं वाहन चालक हो सकता है, उसके परिवार के सदस्य भी हो सकतें हैं, इसलिए सड़क दुर्घटना की समय पर सूचना दिया जाना अब वाहन चालक की नैतिक नहीं बल्कि कानूनी जिम्मेदारी होगी, इसलिए कानून में लायी गई इस मानवीय पहलुओं को समझते हुए इसका विरोध नहीं करने की अपेक्षा सरकार की है। यह कानून ऐसे वाहन चालक पर लागू नहीं होगा और पहले की ही भांति कानूनी स्थिति रहेगी। अतः अफवाहों पर ध्यान ना दें जिम्मेदारी से वाहन चलावें।
पहले हिट एंड रन का कानून क्या था?
भारत में हिट एंड रन के मामले भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत विशेष रूप से दंडनीय नहीं हैं। हालांकि, जब हिट एंड रन मामले का सवाल उठता है तो धारा 279, 304ए और 338 सामने आती हैं। धारा 279 लापरवाह ड्राइविंग की परिभाषा और सजा का प्रावधान करती है। इसमें कहा गया है कि जो कोई भी किसी भी सार्वजनिक स्थान पर इतनी तेजी से या लापरवाही से वाहन चलाता है कि इससे मानव जीवन को खतरा होता है, या किसी अन्य व्यक्ति को चोट या चोट लगने की आशंका होती है, तो उसे कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है या जुर्माना लगाया जा सकता है या एक हजार रुपए या दोनों तक बढ़ाया जा सकता है। आईपीसी की धारा 304ए में लापरवाही से मौत के लिए सजा का प्रावधान है। यह आईपीसी के तहत एक विशेष प्रावधान है और यह धारा सीधे हिट एंड रन मामलों पर लागू होती है जिसके चलते पीड़ितों की मृत्यु हो जाती है। इसमें कहा गया है कि जो कोई भी लापरवाही से किए गए किसी ऐसे कार्य से किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है जो गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में नहीं आता है, तो उसे दो साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाएगा। धारा 338 उस स्थिति में सजा का प्रावधान करती है जब पीड़ित की मृत्यु नहीं हुई हो लेकिन वह गंभीर रूप से घायल हो। इसमें कहा गया है कि जो कोई भी जल्दबाजी या लापरवाही से काम करके किसी व्यक्ति को गंभीर चोट पहुंचाएगा, उसे 2 साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाएगा। मोटर वाहन अधिनियम 1988 भी हिट एंड रन के मामलों में भी लागू होता है। इस कानून में धारा 161, 134(ए) और 134(बी) हिट एंड रन के मामलों से संबंधित हैं।
धारा 161 में हिट एंड रन के पीड़ितों को मुआवजे का प्रावधान है जो मृत्यु के मामले में 25,000 जबकि गंभीर चोट के मामले में 12,500 है। धारा 134(ए) के अनुसार, दुर्घटना करने वाले ड्राइवर को घायल व्यक्ति को तुरंत चिकित्सा सहायता प्रदान करने की आवश्यकता होती है। वहीं धारा 134(बी) में जिक्र है कि चालक को उस दुर्घटना से संबंधित जानकारी यथाशीघ्र पुलिस अधिकारी को देने की आवश्यकता है अन्यथा चालक को दंडित किया जाएगा।
0 आंकड़े क्या कहते हैं?
सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, यह चौंकाने वाली बात है कि देश में सड़क दुर्घटनाओं में हिट-एंड-रन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। 2020 में कुल 52,448 हिट एन्ड रन के मामले सामने आए जिसमें 23,159 लोगों की जान चली गई। वहीं, 2021 में यह आंकड़ा बढ़ा और इस साल ऐसी 57,415 घटनाएं हुईं जिनमें 25,938 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
0 विरोध इस बात का हो रहा
नए नियम आने से ड्राइवरों में इस बात का डर है कि यह उनके खिलाफ बनाया गया है। यदि नए नियम के अनुसार वो घायल की मदद करने जाते हैं ऐसे में उन्हें भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस का दावा है कि संशोधन से पहले जिम्मेदार व्यक्तियों से सुझाव नहीं लिए गए। इसके अलावा देश में एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन प्रोटोकॉल का अभाव है। पुलिस वैज्ञानिक जांच किए बिना ही दोष बड़े वाहन पर मढ़ देती है।

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