नई दिल्ली/चेन्नई
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति को लेकर एक विस्तृत श्वेत पत्र जारी करते हुए राज्य की सत्तारूढ़ DMK सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन और परिवारवाद के गंभीर आरोप लगाए हैं। इस रिपोर्ट में राज्य के बढ़ते कर्ज, राजस्व घाटे और वित्तीय अनुशासन की स्थिति पर सवाल उठाए गए हैं, जिससे सियासी बहस तेज हो गई है।
गोयल ने अपने बयान में कहा कि जीएसटी से मिलने वाला राजस्व लगातार बढ़ने के बावजूद राज्य का खजाना खाली होना चिंताजनक है। उन्होंने पूछा कि जब तमिलनाडु को केंद्र से 80,000 करोड़ रुपये से अधिक का जीएसटी संग्रह प्राप्त हुआ है, तो फिर राज्य को उधारी लेने की जरूरत क्यों पड़ रही है। उन्होंने इसे वित्तीय प्रबंधन की विफलता करार दिया।
बढ़ते कर्ज और घाटे पर चिंता
श्वेत पत्र में बताया गया है कि तमिलनाडु का ऋण-से-जीडीपी अनुपात 26.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो आर्थिक स्थिरता के लिहाज से चिंता का विषय है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2024 तक राज्य का कुल बकाया कर्ज 8.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें लगातार बढ़ता राजस्व घाटा और ब्याज भुगतान का बोझ प्रमुख कारण बताए गए हैं।
गोयल ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार कर्मचारियों के वेतन और भविष्य निधि (PF) के भुगतान में भी देरी कर रही है, जो प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जीएसटी से मिलने वाले संसाधनों का सही तरीके से उपयोग नहीं किया गया।
परिवारवाद पर भी निशाना
केंद्रीय मंत्री ने एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य की सत्ता और प्रशासन पर एक ही परिवार का वर्चस्व है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित हो रही है। गोयल ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया।
डीएमके का पलटवार
इन आरोपों पर डीएमके ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी की सांसद कनिमोझी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा को पहले देश में महंगाई, खासकर एलपीजी सिलेंडर की बढ़ती कीमतों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्यों को पर्याप्त वित्तीय सहयोग देने में विफल रही है और तमिलनाडु के साथ भेदभाव किया जा रहा है।
कनिमोझी ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने सामाजिक कल्याण और विकास योजनाओं के लिए खर्च बढ़ाया है, जिसे केवल कर्ज के नजरिए से देखना उचित नहीं है। उन्होंने गोयल के आरोपों को राजनीतिक बताया।
राजनीतिक बहस तेज
इस मुद्दे पर Bharatiya Janata Party और डीएमके के बीच सियासी टकराव और तेज हो गया है। भाजपा जहां इसे वित्तीय अनुशासन का मामला बता रही है, वहीं डीएमके इसे केंद्र की राजनीति से प्रेरित कार्रवाई करार दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों के बढ़ते कर्ज और राजस्व घाटे का मुद्दा केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशभर में एक व्यापक आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और वित्तीय पारदर्शिता की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है।
फिलहाल, तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति को लेकर जारी यह बहस आने वाले समय में और गहराने की संभावना है, खासकर तब जब राज्य और केंद्र के बीच राजनीतिक मतभेद भी लगातार सामने आ रहे हैं।

