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Friday, April 17, 2026

गोडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक हीरा सिंह मरकाम की पुण्यतिथि आज ,

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CG City News

पाली तानाखार // गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक पूर्व विधायक दादा हीरा सिंह मरकाम की पुण्यतिथि पर पालीतानाखार विधानसभा के कार्यकर्ताओं ने उनकी समाधि पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया

आधुनिक भारत के इतिहास में एक ऐसे हीरे का उदय हुआ जो अविभाजित मध्यप्रदेश के वर्तमान में छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के तिवारता गांव में एक मध्यम परिवार में दादा हीरा सिंह मरकाम जी का जन्म हुआ।
जिनका राजनीतिक सफर की शुरूआत मास्टर की नौकरी को त्याग कर व्याप्त भ्रष्टाचार और आदिवासी, मूलनिवासियों पर हो रहे अन्याय-अत्याचार को देखते हुए हुआ। कहा जाता है कि राजनीति संभावनाओं को हासिल करने की कला है। जिसे प्राप्त करने के लिए आदिवासी समाज के पुरोधाओं ने आदिवासी बाहुल्य राज्य में आदिवासी सत्ता स्थापित करने के लिए भरसक प्रयास किए।

दादा हीरासिंह मरकाम जी भारत देश के एकमात्र ऐसे आदिवासी जननायक हैं जिन्होंने आदिवासी समाज को सामंतवादी, पूंजीवादी और मनुवादी व्यवस्था से निजाद दिलाने सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष खड़ा किया। जिससे अपनी बोली, भाषा, इतिहास, संस्कृति, साहित्य, संवैधानिक अधिकार और जल, जंगल और जमीन को सुरक्षित रखा जा सके

एक मुट्ठी चांवल से गोंडवाना का महाकल्याण का महामंत्र आर्थिक सशक्तिकरण के लिए संदेश दिया

यह वक्त की जरूरत हो और आगे की पीढ़ी दादा हीरा सिंह मरकाम जी के संघर्षों को यही सब कुछ मिसाल के तौर पर याद भी करेगी, लेकिन इसे किसी भी हाल में स्वस्थ सांस्कृतिक के पलड़े में रख पाना संभव भी नहीं है चूंकि सत्ता के गलियारा में मौजूद गिद्ध और राजनीतिक बनिहार कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा लाकर सांस्कृतिक पक्षों के बीच हमेशा हस्तक्षेप करते आए हैं ताकि ये लोग कभी एकजुट न हो पाए।

सामंतवादी, पूंजीवादी और मनुवादी व्यवस्था से निजाद दिलाने सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष खड़ा किया

भारतीय राजनीति के इतिहास को अगर हम खंगालकर देखे तो पता चलता है कि आदिवासी समाज का कांग्रेस के साथ चोली दामन का रिश्ता रहा है। यह रिश्ता वैचारिक कम भावनात्मक अधिक था। इतिहास गवाह है कि भावनाओं के भंवर में आदिवासियों के कई राज-पाठ डूब गए

बढ़ते जनाधार को देखते हुए कांग्रेस और भाजपा की नींद उड़ गई थी

इस बीच भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों ने आदिवासियों के बीच संघर्ष भरी जीवटता और क्षेत्र में मजबूत पकड़ को देखते हुए टिकट दिया और दोनों राजनीतिक दलों से सदन तक पहुंचे लेकिन अब भी आदिवासी समाज उसी हाशिए पर खड़ा था जहां से उन्हें ऊपर उठने ही नहीं दिया जा रहा था। आदिवासियों में एकता के हालिया प्रयास परवान चढ़कर दिखाई दे रहा था। प्रश्न यह नहीं है कि यह प्रयास चुनावी राजनीति में कितना सफल या असफल रहा लेकिन अभी तक की राजनीतिक हलचल से एक बात तो तय है कि राजनीति में विकल्प कभी मरता नहीं, केवल कुछ समय के लिए अदृश्य हो सकता है।


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