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Wednesday, April 22, 2026

मामूली 100 रुपये के झूठे केस में दशकों बाद राहत, लेकिन पेंशन अभी भी दूर।

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CG City News

100 रुपये का आरोप, 39 साल का संघर्ष: जागेश्वर अवधिया की जिंदग़ी का दर्द

किसी व्यक्ति की जिंदगी को बर्बाद करने के लिए कभी-कभी बड़ी घटनाओं की जरूरत नहीं होती—कभी-कभी मात्र 100 रुपये भी पर्याप्त होते हैं। 83 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधिया इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। 1986 में उन पर 100 रुपये रिश्वत लेने का झूठा आरोप लगा और उसी क्षण से उनका जीवन एक ऐसे अंधेरे सुरंग में धकेल दिया गया, जिससे बाहर निकलने में उन्हें लगभग चार दशक लग गए। आज भी, जब वे अदालत से निर्दोष साबित हो चुके हैं, तब भी उनकी जंग खत्म नहीं हुई है। वे अब पेंशन, रुका हुआ वेतन और अन्य बकाया पाने के लिए विभागों के चक्कर काट रहे हैं।

निलंबन ने छीनी नौकरी और सम्मान

1986 में आरोप लगते ही अवधिया को तत्काल निलंबित कर दिया गया। यह निलंबन केवल औपचारिक नहीं, बल्कि उनकी पूरी जिंदगी पर असर डालने वाला था।
छह वर्षों तक निलंबित रहने का मतलब था—

  • वेतन का बड़ा हिस्सा कट गया

  • प्रमोशन रुक गया

  • इंक्रीमेंट बंद हो गया

  • विभाग में उनकी छवि संदिग्ध के रूप में दर्ज हो गई

उस समय की परिस्थितियों को याद करते हुए वे बताते हैं कि उनके पड़ोसी और रिश्तेदार भी उन्हें अपराधी की नजर से देखने लगे थे। इस बदनामी का सबसे ज्यादा असर उनके परिवार पर हुआ।

परिवार टूटा, पत्नी तनाव में चल बसीं

झूठे आरोप और लंबी निलंबन अवधि ने उनके घर की आर्थिक स्थिति कमजोर कर दी।
बच्चों की पढ़ाई मुश्किल हुई, घरेलू खर्चों पर संकट आने लगा। इन तनावों के बीच उनकी पत्नी मानसिक दबाव में आकर बीमार पड़ीं और अंततः उनका निधन हो गया।

अवधिया आज भी दर्द भरी आवाज में कहते हैं—
“अगर मुझ पर यह झूठा केस नहीं बनाया जाता, तो शायद मेरी पत्नी आज ज़िंदा होती।”

39 साल लंबी कानूनी लड़ाई आखिर जीती, लेकिन…

लगातार अपील, दस्तावेज़, तारीखें और इंतजार—इन सबने उनके 39 साल खा लिए।
आखिरकार 2025 में हाई कोर्ट ने उन्हें निर्दोष घोषित किया। अदालत ने माना कि रिश्वत का आरोप साबित नहीं होता और मामला पूरी तरह झूठा था।

लेकिन न्याय मिलने के बाद भी राहत नहीं मिली।
अब वे अपने हक के पैसे पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं—जिसे वे अपनी आखिरी उम्मीद कहते हैं।

पेंशन और 30 लाख रुपये के बकाये के लिए नई जंग

निर्दोष साबित होने के बाद उन्होंने 29 सितंबर 2025 को छत्तीसगढ़ अधोसंरचना विकास निगम (CIDC) के एमडी को पत्र भेजकर लगभग 30 लाख रुपये के बकाये का दावा किया।
इसमें शामिल हैं—

  • निलंबन अवधि का कटाया गया वेतन

  • रुके हुए इंक्रीमेंट

  • पेंशन

  • और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ

लेकिन विभाग तीन महीने से एक ही बात दोहरा रहा है—
“सर्विस बुक नहीं मिल रही है…”

83 साल की उम्र में यह टालमटोल उन्हें बेहद थका देती है।

दो राज्यों की फाइलों में उलझा जीवन

मामला इसलिए और उलझ गया क्योंकि अवधिया का नौकरीकाल तब शुरू हुआ जब वे मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम में कर्मचारी थे।
विभाग कहता है कि भुगतान मध्य प्रदेश से होना चाहिए, जबकि—

  • 2004 में CIDC खुद उनके रिटायरमेंट संबंधी भुगतान दे चुका है

  • 21 नवंबर 2025 को मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम ने लिखित रूप से कहा—
    “जागेश्वर अवधिया CIDC के कर्मचारी हैं”

यानी अब जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से CIDC पर है, फिर भी कार्यवाही अटकी हुई है।

83 साल के व्यक्ति की अपील

CIDC के एमडी दावा करते हैं कि प्रक्रिया जारी है और जल्द कार्रवाई होगी।
लेकिन अवधिया जानते हैं कि ‘जल्द’ का मतलब प्रशासनिक भाषा में कितना लंबा हो सकता है।

फिर भी वे उम्मीद नहीं खोते।
उनके शब्द हैं—
“एक उम्र इंतजार में बीत गई। अब चाहता हूँ कि जीवन के अंतिम पड़ाव में मुझे मेरा हक मिल जाए।”


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