दुर्ग के युवा उद्यमी अंकुश जैन ने चार साल की मेहनत से एक बायोडिग्रेडेबल पोषक कप विकसित किया है, जिसे भारत सरकार से पेटेंट मिला है। 11 जैविक तत्वों से बना यह कप पौधों को पोषण देता है और प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करता है।
- नर्सरी तैयार होने का समय 30 से 20 दिन हुआ
- कीटनाशकों की आवश्यकता 50% तक कम होती है
दुर्ग के युवा उद्यमी अंकुश जैन ने चार साल की मेहनत और 260 प्रयोगों के बाद एक ऐसा ‘बायोडिग्रेडेबल पोषक कप’ विकसित किया है, जिसे इसी साल भारत सरकार ने पेटेंट से नवाजा है।
11 जैविक तत्वों से बना यह कप न केवल पौधों को खाद बनकर पोषण देता है, बल्कि प्लास्टिक के प्रदूषण को भी जड़ से खत्म करता है। रोपाई के समय इसे निकालने का झंझट नहीं है। यह मिट्टी में घुलकर खुद प्रकृति का हिस्सा बन जाता है। यह नवाचार आधुनिक खेती के लिए एक सस्ता, सुरक्षित और हरा-भरा भविष्य है।
आज जब खेती में प्लास्टिक का उपयोग मिट्टी की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है, ऐसे समय में यह तकनीक एक कारगर समाधान के रूप में सामने आई है। पारंपरिक काली पालिथीन और प्लास्टिक ट्रे के विकल्प के रूप में यह जैविक कप न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि पौधों के विकास में भी सहायक सिद्ध हो रहा है।
एमबीए स्नातक अंकुश जैन ने यह कप 11 जैविक तत्वों गोबर, वर्मी कंपोस्ट, नीम खली, सरसों खली, करंज खली व चूना पत्थर के मिश्रण से तैयार किया है। इसकी कीमत फिलहाल चार रुपये है, जिसे मांग के अनुसार और घटाया जा सकता है। पिछले पांच महीनों में लगभग एक लाख कप तैयार कर मध्यप्रदेश, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र व ओडिशा सहित कई राज्यों में सप्लाई की जा चुकी है।
तकनीक की खासियत
तेजी से विकास: नर्सरी अब 30 की बजाय सिर्फ 20 दिनों में तैयार हो रही है।
बेहतर जड़ें: जैविक कपों में जड़ें गहराई तक बढ़ती हैं, जिससे पौधा मजबूत बनता है।
कीटनाशक कम: रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे लागत 50% तक घटती है।
जीरो ट्रांसप्लांट शाक: जड़ें सुरक्षित, कप खाद बनकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।
लागत में कमी, उत्पादन में वृद्धि
इस जैविक कप में मौजूद पोषक तत्व पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, जिससे कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों की जरूरत लगभग 50% तक घट जाती है। जड़ों के बेहतर विकास से पौधे अधिक मजबूत और स्वस्थ बनते हैं, परिणामस्वरूप उत्पादन की गुणवत्ता भी सुधरती है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही पहचान
दिल्ली के एआइ टेक और पुणे की बड़ी कृषि प्रदर्शनियों में इस स्टार्टअप को काफी सराहा गया है। यह नवाचार न केवल रासायनिक खेती को जैविक खेती की ओर मोड़ने का एक बड़ा जरिया बन रहा है, बल्कि प्लास्टिक कचरे को कम कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
एग्री-टेक की ओर बदला करियर
रेयर एग्रीकल्चर वेल्थ प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक अंकुश जैन ने कहा कि, साल 2012 में मुंबई से एमबीए करने के बाद रियल एस्टेट के क्षेत्र में काम शुरू किया था। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि प्रदेश में कृषि भूमि का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है और किसानों की रुचि भी कम हो रही है।
इस सोच ने उन्हें साल 2017 में खेती की ओर मोड़ा। उन्होंने 11 एकड़ में ग्रीनहाउस स्थापित किया और नर्सरी से जुड़ी समस्याओं को करीब से समझा। इन्हीं अनुभवों ने उन्हें इस इको-फ्रेंडली कप के विकास के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने साल 2022 में अपने स्टार्टअप की नींव रखी थी। इस तकनीक से पौधों की मृत्यु दर लगभग शून्य तक पहुंच जाती है, और स्वस्थ पौधों से ‘ग्रेड-ए’ उपज मिलती है, जिसे बाजार में बेहतर कीमत हासिल होती है।

